देव परंपरा निभाने के बाद महर्षि मारकंडे पेड़चा अपने मूल स्थल मकराहड़ को लाबलश्कर के साथ रबाना
कुल्लू। तीन दिवसीय पेड़चा बैसाखी उत्सव की देव परम्परा निभाने के पश्चात् सोमवार को अपने बड़े भाई महर्षि मार्कण्डेय थरास के निमंत्रण पर मूल मार्कंडेय ऋषि थरास के सम्मान में प्रतिवर्ष पांच प्रविष्टि बेशाख को मनाए जाने वाले तीन दिबसीय थरास मेले में भाग लेकर दो भाई परस्पर 7 वर्ष बाद राउल बेहड़ में भव्य देव मिलन करेंगे। देवता के कारदार रमेश शर्मा, कमली राम, टीसी महंत, पुजारी नरोतम दत शर्मा, किशोरी लाल शर्मा, काईथ लाल चांद चौहान आदि ने जानकारी देते हुऐ बताया कि तीन दिनों तक थरास मेले में परंपरागत वेशभूषा के साथ लोक संस्कृति की छठा बिखेरी
जाएगी। इस दौरान महर्षि मारकंडे पेड़चा अपने भाई से भव्य देव मिलन करने के पश्चात मकराहड़ रियासत की तपोस्थली मकराहड़ मंदिर में देव परिक्रमा करने के साथ अपनी प्रक्टो स्थली को स्पर्श कर धरती मां का आशिर्बाद लेती बार बारम्बार अपनी जन्मस्थली की धरती में लौटकर हरियानो को भाब विभोर करते हैं। अपने मूल स्थल मकराहड़ के देवप्रवास के दौरान महर्षि मारकंडे पेड़चा अपनी सैकड़ों हरियानो के साथ ऋषि की तपो भूमि मकराहड़ की तलहटी से प्रवाहित होने बाली ब्यास और गोमती नदी के संगम स्थल पर शाही स्नान करने के पश्चात ही अपने देबालीया की ओर प्रस्थान करेंगे।
मान्यता के अनुसार जब कालांतर में एक महिला को मकराहड़ के साथ लगते खेतो में महिला को खेती करते समय जब महर्षि मारकंडे मुख रूप में प्रकट हुए तो मिट्टी से लथपथ मार्कंडेय ऋषि के मुख को महिला ने साफ करने के लिए मुख् की प्रकटो स्थली के समीप से प्रवाहित होने बाली ब्यास और गोमती नदी में ले गई। जहां मुख को सफा करते समय अकाशबानी हुई कि में मार्कंडे ऋषि हूं, तब से लेकर आज तक मूल महर्षि मारकंडे थरास प्रतिवर्ष वैशाख संक्रांति को शाही स्नान करते हैं। इसी परंपरा का निर्वहन थरास पहुंचकर महर्षि मार्कंडेय पेड़चा सेकड़ों वर्षों से आज भी निभाते हैं तथा ब्यास और गोमती नदी के संगम स्थल पर अपनी हरियानो के साथ शाही स्नान के पश्चात मूल स्थल मकराहड़ से दिव्य शक्ति प्राप्त कर ही अपने देवालीया पेड़चा को लौटते हैं।








