छम छम गिरती बूंदों से पूछा मैंने चुपके से…… अब की बार क्यों देर लगा दी, प्यासी आंखे इस धरा की. जाने कब से रहीं तरस, दीदार तुम्हारा पाने को. उदास मन से बोलीं… वो. मैं भी कब से आतुर थी, उस धरा पर आने को यहीं से मेरा जन्म हुआ. तो अपना फर्ज निभाने को.. मेरा भी मन करता है.. हर बगिया को महकाने को. पर अपना बजूद कहाँ से पाऊँ. नदियाँ, नाले सब सूख गए. जहाँ से जन्म लेती हूँ.. पहाड़ हुए जर्जर. सूख गए झरने. मानव की प्यास बुझाने में.. उठी धरा से गगन की ओर, और देख के जलवा इंसानों का. पेड़ हुए विलुप्त धरा से, बंजर हो गया हरा भरा संसार सर्दियों में भी नंगे पहाड़ चीख चीखकर रहे पुकार! मन नहीं करता. फिर से मेरा मुड़कर धरा पर आने का. बंधी हुई हूँ.. फर्ज की खातिर. भले ही देर से उतरी नीचे. पर नहीं भूली हूँ. फर्ज अपना. जैसे इंसा भूल रहा…….. सुना जब दर्द उसका मैनें दिल में कुछ टीस उठी. क्यों मानव बदल रहा है. अपने स्वार्थ के कारण है. छम छम गिरती बूंदों ने. अपना दर्द तो सुना दिया. अपना कर्ज तो अदा किया. इस धरा को किया हरा।कविता के लेखक श्री विक्रम वर्मा जी

छम छम गिरती बूंदों से
पूछा मैंने चुपके से……
अब की बार क्यों देर लगा दी,

प्यासी आंखे इस धरा की.
जाने कब से रहीं तरस,
दीदार तुम्हारा पाने को.

उदास मन से बोलीं… वो.
मैं भी कब से आतुर थी,
उस धरा पर आने को
यहीं से मेरा जन्म हुआ.
तो अपना फर्ज निभाने को..

मेरा भी मन करता है..
हर बगिया को महकाने को.
पर अपना बजूद कहाँ से पाऊँ.
नदियाँ, नाले सब सूख गए.
जहाँ से जन्म लेती हूँ..

पहाड़ हुए जर्जर. सूख गए झरने.
मानव की प्यास बुझाने में..
उठी धरा से गगन की ओर,
और देख के जलवा इंसानों का.

पेड़ हुए विलुप्त धरा से,
बंजर हो गया हरा भरा संसार
सर्दियों में भी नंगे पहाड़
चीख चीखकर रहे पुकार!

मन नहीं करता. फिर से मेरा
मुड़कर धरा पर आने का.
बंधी हुई हूँ.. फर्ज की खातिर.
भले ही देर से उतरी नीचे.

पर नहीं भूली हूँ.
फर्ज अपना.
जैसे इंसा भूल रहा……..

सुना जब दर्द उसका मैनें
दिल में कुछ टीस उठी.
क्यों मानव बदल रहा है.
अपने स्वार्थ के कारण है.

छम छम गिरती बूंदों ने.
अपना दर्द तो सुना दिया.
अपना कर्ज तो अदा किया.
इस धरा को किया हरा….

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